दूसरा दिन माई के ऊ रूप पूजल जाला जे हाथ में कवनो हथियार ना धरेली। एक हाथ में जप के माला, दूसरा में कमंडल। ब्रह्मचारिणी के ताकत उनकर तप ह।

ब्रह्म माने तप आ चारिणी माने ओह पर चले वाली। हिमालय के घर जनमला के बाद पार्वती मन में ठान लिहली कि शिव के ही पति के रूप में पाइब। नारद मुनि के कहला पर ऊ जंगल में तप करे चल गइली। कथा कहेला कि पहिले ऊ खाली फल फूल खइली, फेर साग पात पर रहली, फेर गाछ से झरल सूखल बेलपत्र पर। आखिर में ऊहो छोड़ दिहली। पत्ता तक ना खइला के चलते उनकर एगो नाम पड़ल अपर्णा। बेटी के ई हाल देख के माई मैना घबड़ा के कहली, "उ मा", माने "अरे, अइसन मत कर"। कहल जाला कि एही से पार्वती के नाम उमा पड़ल। आखिर में ब्रह्मा जी परगट भइले आ कहले कि अइसन तप आज ले केहू ना कइल, तोहार मनोरथ पूरा होई।

माई उज्जर बस्तर पहिरले, नंगे गोड़ चलत देखावल जाली। ना कवनो सवारी, ना कवनो हथियार। ई रूप सिखावेला कि बड़ काम एक दिन में ना होला। धीरज, नियम आ लगन से होला। पढ़े वाला लइका लइकी, परदेस में कमाए गइल जवान, खेत में सालों भर खटे वाला किसान, सभे अपना अपना ढंग के तपस्वी बा।

भोजपुरी समाज एह कथा के खाली सुनबे ना करेला, जियबो करेला। हमनी के माई बहिन के बरत देखीं: तीज में निर्जला, जितिया में निर्जला, छठ में छत्तीस घंटा के उपवास। ई सब ओही तप के परंपरा के कड़ी ह, जेकर पहिला नाम पार्वती बा। बियाह के गीत में आजो गौरा के तप आ शिव के बरियात गावल जाला। नवरात्र के साँझ जब टोला के मेहरारू लोग माई के थान पर जुट के पचरा गावेली, त ओह गीत में माई देवी कम, घर के बेटी जादे लागेली।

अब बिज्ञान के बात। उपवास पर पिछला कुछ साल में बहुत शोध भइल बा। कुछ अध्ययन बतावेला कि नियम से, सोच समझ के कइल उपवास से वजन आ खून में चीनी पर काबू में मदद मिल सकेला। बाकिर नतीजा सबका में एके जइसन नइखे आ ई कवनो दवाई ना ह। मधुमेह के मरीज, गर्भवती महतारी, बूढ़ पुरनिया आ रोज दवा खाए वाला लोग के डाक्टर से पूछ के ही बरत करे के चाहीं। बरत में पानी पियत रहीं, फल, दूध आ मखाना जइसन हल्का चीज खाईं। जवन बात पक्का बा ऊ ई कि अपना मन पर काबू राखे के अभ्यास आदमी के भीतर से मजबूत बनावेला। ब्रह्मचारिणी के असली सीख इहे ह।

आज माई के चीनी भा मिसरी के भोग लागेला। रंग उज्जर मानल जाता, जे सादगी आ शांति के रंग ह। रंग के चलन नया बा आ भोग के रीत घर घर में अलग हो सकेला।

रउआ घर के मेहरारू लोग नवरात्र में कवन पचरा गावेली? ओकर बोल भा रिकार्डिंग [email protected] पर भेजीं।