सातवाँ दिन माई के सबसे भयानक रूप सामने आवेला। रंग अन्हरिया रात जइसन करिया, केस खुलल, साँस से आगि। बाकिर एही माई के दूसरा नाम शुभंकरी ह, माने सुभ करे वाली।
माई के तीन गो आँख बा, गला में बिजुरी जइसन चमकत माला, आ सवारी गदहा के। एक हाथ में खड्ग आ दूसरा में लोहा के काँटा बा। बाकी दू हाथ में से एगो अभय देला आ दूसरा बरदान। मतलब रूप डेरवावे वाला बा, बाकिर भगत खातिर हाथ खुलल बा।
कथा रक्तबीज नाम के असुर के ह। ओकरा बरदान रहे कि ओकर खून के जेतना बूँद धरती पर गिरी, ओतने नया रक्तबीज पैदा हो जाई। देवी ओकरा के जेतना मारस, ओकर फौज ओतने बढ़त जाए। तब माई आपन सबसे उग्र रूप धइली। देवी महात्म्य में एह रूप के काली कहल गइल बा, आ लोक परंपरा में एही के कालरात्रि मानल जाला। ऊ रक्तबीज के खून के हर बूँद धरती पर गिरे से पहिले पी गइली। बीया ना बचल त असुर भी ना बचल।
एह कथा में एगो गहिर बात बा। कुछ बुराई अइसन होला जे ऊपर से काटला पर आउर फइलेला, जइसे अफवाह, बैर भा नशा। ओकरा के जड़ से रोके के पड़ेला। आ कबो कबो प्रेम के भी कठोर रूप धरे के पड़ेला। जे महतारी लइका के बचावे खातिर बाघिन बन जाले, ओकरा के केहू भयानक ना कहेला।
सप्तमी भोजपुरी इलाका में पूजा के असली शुरुआत ह। आज पंडाल में माई के पट खुलेला, आँख से परदा हटेला आ मेला लाग जाला। नेपाल में आज फूलपाती के दिन ह, जब नौ तरह के पत्ता आ फूल घर के पूजा में ले आवल जाला। माई के उग्र रूप के थान हमनी के धरती पर जगह जगह बा। गोरखपुर लगे तरकुलहा देवी के कथा बाबू बंधू सिंह से जुड़ल बा, जे तरकुल के गाछ तर माई के पूजत रहले, 1857 के लड़ाई के दौर में अंगरेजी राज से भिड़ले आ फाँसी चढ़ले। लोक कथा कहेला कि फाँसी के रस्सी कई बेर टूटल। इतिहास आ आस्था कहाँ अलग होला, ई गाँव के कथा में खोजल मुश्किल बा। बाकिर एतना साफ बा कि कमजोर आदमी जब जुलुम से लड़ेला त माई के एही रूप के गोहरावेला।
अन्हार से डर आदमी के सुभाव में बा। जब बिजुरी ना रहे, तब रात सचमुच खतरा के घरी रहे। मन के जानकार लोग कहेला कि डर से भगला पर डर बढ़ेला, आ ओकरा के धीरे धीरे सामने से देखला पर घटेला। सप्तमी के रात जागल, दिया बारल आ पूरा गाँव के संगे अन्हार में बइठल, ई ओही बात के पुरान रूप ह। आज के भोग गुड़ ह। गुड़ में चीनी के मुकाबले तनी लोहा आ खनिज रहेला, बाकिर ऊ भी मीठा ही ह, एह से थोरके खाईं।
रंग आज धूसर मानल जाता। रंग के चलन नया बा आ भोग के रीत घर घर में अलग हो सकेला।
रउआ गाँव के माई थान के कथा का ह? पुरनिया से पूछ के [email protected] पर लिख भेजीं।
