जब कुछ ना रहे, ना धरती, ना अकास, खाली अन्हार रहे, तब माई तनी सा मुस्कइली। कथा कहेला कि ओही मुस्कान से पूरा ब्रह्मांड बन गइल। चउथा दिन ओही माई कूष्मांडा के ह।

नाम के भीतर ही कथा बा। कु माने तनी सा, ऊष्मा माने गरमी आ अंड माने अंडा। माने ऊ शक्ति जे तनी सा गरमी से ब्रह्मांड रूपी अंडा के जनम दिहलस। मान्यता ह कि माई के निवास सूरज मंडल के भीतर बा। ओहिजा के ताप सहे के ताकत खाली उनके में बा, आ सूरज के चमक उनके तेज से बा। माई के आठ हाथ बा, एह से उनका के अष्टभुजा भी कहल जाला। हाथ में कमंडल, धनुष, बान, कमल, अमरित के कलश, चक्र, गदा आ जप के माला बा। सवारी सिंह के ह।

कूष्मांड शब्द के एगो आउर अरथ बा, आ ऊ हमनी के बारी में फरेला। संस्कृत में कूष्मांड माने भतुआ, जेकरा के नेपाली में कुभिन्डो कहल जाला। दुर्गा पूजा आ दसईं में कई घर में पशु बलि के जगह भतुआ काटल जाला। तराई-मधेस आ भोजपुरी इलाका के बहुत परिवार अब इहे रीत अपना लेले बा। पूजा के बाद ओही भतुआ से आ उरिद के दाल से अदौरी बनेला, जे जाड़ा भर तरकारी में पड़ेला। देवी के नाम, बलि के रीत आ रसोई के सवाद, तीनो एके फल में मिल जाला। देहात में धरम आ जिनगी अलग अलग खाना में ना रहेला।

एह रूप के मतलब का बा? अन्हार में मुस्काए के हिम्मत। जब चारो ओर कुछ ना लउके, तब पहिला कदम उठावल ही सिरजन ह। जे महतारी खाली हाथ घर चलावेली आ तबो लइकन के सामने हँसत रहेली, ऊ एह कथा के रोज दोहरावेली।

बिज्ञान के नजर से देखीं त एह कथा में एगो सच्चाई साफ लउकेला। धरती पर जिनगी के लगभग पूरा ऊर्जा सूरज से आवेला। गाछ बिरिछ घाम से आपन खाना बनावेला, आ ओही से हमनी के थरिया भरेला। अबहीं खेत में जवन धान पाकत बा, ऊ सूरज के घाम के ही बदलल रूप ह। पुरखा लोग जब कहले कि सिरजन के शक्ति सूरज के भीतर बसेला, त ऊ आपन भाषा में उहे बात कहले जे आज किताब में पढ़ावल जाला। तीन हफ्ता बाद छठ में हमनी फेर ओही सूरज के अरघ देब। भतुआ के बात करीं त ओह में नब्बे फीसदी से जादे पानी होला, एह से ऊ हल्का आ पेट खातिर नीमन मानल जाला।

आज माई के मालपुआ के भोग लागेला। रंग गहिर नीला मानल जाता। रंग के चलन नया बा आ भोग के रीत घर घर में अलग हो सकेला।

रउआ घर में पूजा के भतुआ से का बनेला? आपन रसोई के रीत [email protected] पर लिख भेजीं।