आसिन के अँजोरिया परिवा से शारदीय नवरात्र शुरू हो जाला। पहिला दिन घर घर में कलश बइठावल जाला, माटी में जौ बोअल जाला आ हिमालय के बेटी माई शैलपुत्री के पूजा होला।
अतवार के भोरे तराई-मधेस से लेके गंगा के कछार ले गाँव के अँगना गोबर से लिपा जाई। पूजा घर में माटी के बेदी बनी, ओह में जौ छींटल जाई आ ओकरा बीच में पानी भरल कलश बइठावल जाई। कलश पर आम के पल्लो आ नरियर धराई, बगल में अखंड दिया बरी। नेपाल में एही के घटस्थापना कहल जाला आ एही दिन से दसईं के गिनती शुरू होला। नाम अलग बा, रीत एके बा: नौ दिन माई घर में पाहुन बाड़ी।
शैल माने पहाड़ आ पुत्री माने बेटी। कथा कहेला कि पिछला जनम में माई राजा दक्ष के बेटी सती रहली। दक्ष एगो बड़हन जग्य कइले बाकिर अपना दामाद शिव के नेवता ना दिहले। सती बिना बोलवले नइहर गइली, ओहिजा पति के अपमान सुनली आ जोग के आगि में आपन देह तेज दिहली। अगिला जनम में ऊ पर्वतराज हिमालय के घर जनमली, एही से नाम पड़ल शैलपुत्री। माई बैल पर सवार बाड़ी, दहिना हाथ में तिरसूल आ बावाँ हाथ में कमल बा।
भोजपुरी इलाका में ई कथा पोथी से बहरी, धरती पर भी जियत बा। सारन जिला के आमी में अम्बिका भवानी के मंदिर बा। लोक मान्यता ह कि दक्ष के जग्य एही जगह भइल रहे। आ हिमालय त हमनी खातिर कथा के पहाड़ नइखे। साफ दिन में मधेस के खेत से उत्तर ओर ताकीं त जवन उज्जर चोटी लउकेला, माई ओही घर के बेटी हई। गंडक, बागमती आ कोसी ओही पहाड़ से उतर के हमनी के खेत पटावेली। एह नजर से देखीं त शैलपुत्री के पूजा ओह पहाड़ आ ओह पानी के पूजा भी ह, जेकरा भरोसे देहात के जिनगी चलेला।
जौ बोए के रीत पर तनी ठहर के सोचे लायक बा। नवरात्र ठीक ओह घरी पड़ेला जब धान पाकत रहेला आ रबी के बोआई सामने रहेला। पुरनिया लोग नौ दिन में जौ के अँखुआ देख के अंदाज लगावेला कि बीया में केतना जान बा आ अगिला फसल कइसन रही। आज के भाषा में कहीं त ई बीया के जमाव जाँचे के घरेलू तरीका ह। ई कवनो प्रयोगशाला के नतीजा ना ह, बाकिर पीढ़ी दर पीढ़ी के खेतिहर अनुभव जरूर ह। एही घरी बरखा जात रहेला आ जाड़ा आवत रहेला, एह से नौ दिन हल्का आ सादा खाए के चलन देह के भी सुहाला।
पहिला दिन माई के गाय के घीव चढ़ावल जाला। आज के रंग नारंगी मानल जाता। एगो बात साफ रहे के चाहीं: दिन के हिसाब से रंग के चलन नया बा, आ भोग के परंपरा इलाका आ परिवार के हिसाब से अलग अलग हो सकेला। रउआ घर में जवन रीत चलत आइल बा, उहे रउआ खातिर सही बा।
रउआ गाँव में कलश कइसे बइठावल जाला? आपन बोली में नवरात्र के गीत, कथा भा फोटो [email protected] पर भेजीं। देहात ओकरा के अभिलेख में सहेज के राखी।
