नौ दिन के जतरा आज पूरा होला। पहाड़ के बेटी से शुरू भइल कथा ओह माई पर आके ठहरेला जे सब कुछ देवे वाली हई। महानवमी के दिन माई सिद्धिदात्री के पूजा होला।
सिद्धि माने पूरा भइल साधना, आ दात्री माने देवे वाली। पुरान में आठ गो सिद्धि गिनावल गइल बा: अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व आ वशित्व। देवी पुरान के कथा ह कि खुद शिव एही माई के पूजा क के सब सिद्धि पवले। माई के किरपा से उनकर आधा देह देवी के हो गइल, आ ऊ अर्धनारीश्वर कहइले। माई कमल पर बइठल बाड़ी। चार हाथ में चक्र, गदा, शंख आ कमल बा। देवता, रिसि, गंधर्व आ असुर ले, सभे उनका सामने हाथ जोड़ले ठाढ़ बा।
अर्धनारीश्वर के रूप पर तनी रुकीं। आधा शिव, आधा शक्ति। एह मूरत के कहनाम साफ बा: मरद आ मेहरारू में केहू ऊपर नइखे, केहू नीचे नइखे, आ एक के बिना दूसरा अधूरा बा। जवन बात आज बरोबरी के नाम से कहल जाला, ऊ हमनी के परंपरा में पत्थर पर खोदल बा।
नौ रूप के एक संगे देखीं त एगो पूरा जिनगी लउकेला। शैलपुत्री बेटी हई, ब्रह्मचारिणी साधना करत जवान लइकी, चंद्रघंटा दुलहिन, कूष्मांडा सिरजन करे वाली, स्कंदमाता महतारी, कात्यायनी आ कालरात्रि लड़े वाली जोधा, महागौरी शांत उजास, आ सिद्धिदात्री सब कुछ बाँट देवे वाली बूढ़ पुरनिया। नवरात्र एक तरह से औरत के पूरा जिनगी के पूजा ह।
गाँव घर में आज हवन होई आ ओकरा संगे नौ दिन के पूजा के पूरनाहुति। जे अष्टमी के कन्या ना जेंववले, ऊ आज जेंवाई। काल्ह, 20 अक्टूबर मंगर के, विजयादशमी ह। पहिला दिन बोअल जौ अब बित्ता भर के पियर हरियर जयंती बन गइल बा। बड़ बूढ़ ओकरा के लइकन के कान पर खोंस के असीरबाद दिहें। नेपाल में माथ पर टीका आ जमरा चढ़ी। परदेस से घर लौटल बेटा बेटी खातिर इहे पल साल भर के कमाई ह। साँझ के ढोल ताशा के संगे माई के मूरत भसान खातिर निकली, आ मेहरारू लोग के आँख भर आई, काहे कि बेटी फेर ससुरार जात बाड़ी। जाए घरी नीलकंठ चिरई लउक जाए त ऊ सुभ मानल जाला।
बिज्ञान के नजर से आज दू गो बात। पहिला, आज के भोग तिल। तिल में तेल, प्रोटीन आ कैल्शियम भरपूर होला, आ जाड़ा के दुआर पर ऊ देह के ताकत देला। हलुआ, पूड़ी आ चना के थरिया नौ दिन के हल्का खाना के बाद देह के फेर भरल भोजन पर लौटावेला। दूसरा, हवन। कई लोग कहेला कि हवन के धुआँ हवा साफ करेला। एह दावा के पक्का प्रमाण नइखे, आ धुआँ कवनो भी होखे, बंद कोठरी में फेफड़ा खातिर नीमन ना होला। एह से हवन खुला अँगना में करीं आ छोट बच्चा, बूढ़ आ दमा के मरीज के धुआँ से तनी दूर राखीं। परंपरा निभावल आ सेहत बचावल, दूनो संगे हो सकेला।
रंग आज मोरपंखी हरियर मानल जाता। रंग के चलन नया बा आ भोग के रीत घर घर में अलग हो सकेला। माई सबके घर भरल राखस, आ अगिला साल फेर नइहर आवस।
नवरात्र भर रउआ जवन गीत, कथा आ फोटो सहेजनी, ऊ [email protected] पर भेजीं। देहात ओकरा के अभिलेख में सुरक्षित राखी।
