घटस्थापनासँ विजया दशमी धरि, तराई-मधेसक साँझमे माथ पर छेदल घैल आ ओहिमे जरैत दीप ल' क' महिला सभ गोल घेरामे नचैत छथि। झिझिया मात्र नाच नहि, सन्तान आ समाजक रक्षाक लेल मिथिलाक माय सभक सामूहिक प्रार्थना थिक, जे कतेको बेर मेटाइत-मेटाइत बचल अछि।

दसैं लगिचाइत अछि त' मिथिलाक साँझ बदलि जाइत अछि। सुरुज डुबिते आँगन, चौबटिया आ मन्दिरक प्राङ्गणमे ढोल आ झालिक थाप उठैत अछि। पाँचसँ पन्द्रह गोटेक टोलीमे महिला आ बेटी सभ ठाढ़ होइत छथि। माथ पर माटिक घैल, जाहिमे अनगिनत छोट-छोट छेद काटल रहैत अछि आ भीतर दीप जरैत रहैत अछि। छेद सभसँ बहराइत इजोतक बुन्नी अन्हारमे छिटकि जाइत अछि, आ टोली गीत गबैत गोल-गोल घुमि नचैत अछि। ई थिक झिझिया, जकरा किछु ठाम झिझरी सेहो कहल जाइत अछि।

झिझिया घटस्थापनाक साँझसँ आरम्भ भ' विजया दशमी धरि, लगातार दस साँझ नाचल जाइत अछि। पहिल दिन कोनो पवित्र स्थान पर नाचि क' एकर विधिवत आरम्भ होइत अछि। तकर बाद टोली घर-घर जाइत अछि, आँगन-आँगनमे नाच देखबैत अछि आ गृहस्थसँ अन्न आ किछु दक्षिणा मँगैत अछि। दशमीक दिन अन्तिम पूजा होइत अछि आ जमा भेल अन्न-पाइसँ सामूहिक भोज होइत अछि। नेपाल आ भारत, दुनू दिसक मिथिलामे ई परम्परा एके रंगेँ साँस लैत अछि, आ एकर छाया भोजपुरी भाषी गाम धरि पसरल अछि।

झिझियाक मूलमे रक्षाक भाव अछि। ई नाच देवी दुर्गाकेँ समर्पित मानल जाइत अछि, आ लोकविश्वास अछि जे एहिसँ सन्तान, परिवार आ गामक रक्षा डाइन-जोगिन आ टोना-टापरसँ होइत अछि। घैलक छेद सभक सम्बन्धमे एकटा पुरान डर सेहो जीवित अछि: जँ कोनो डाइन नचैत महिलाक माथ परक घैलक छेद गनि लेलक, त' नचनिहारिक प्राण चलि जाएत। तेँ टोली घुमैत रहैत अछि, गीत नहि रुकैत अछि, आ इजोत कतहु स्थिर नहि रहैत अछि। किछु गोटे एकर दोसर व्याख्या करैत छथि: छेद सभ असुरक आँखि थिक, जे भीतरक दीपक इजोतसँ चोन्हरा जाइत अछि, आ ओ इजोत आशाक किरण थिक।

एहि नाचक जन्मक कोनो लिखित प्रमाण नहि अछि। ई पुस्त-दर-पुस्त मुँहेँ-मुँहेँ चलल परम्परा थिक। सभसँ प्रचलित कथा राजा चित्रसेनक अछि। निःसन्तान राजा अपन भातिज बलरुचिकेँ उत्तराधिकारी बनौलनि। तन्त्र-मन्त्रमे पारंगत युवा रानी बलरुचि पर मोहित भेलीह, आ ठुकराओल गेला पर बदला लेबाक लेल रोगक स्वाङ रचलनि। हुनक कहब छलनि जे बलरुचिक खूनसँ नहेला पर मात्र ओ ठीक होएतीह। सिपाही सभ बलरुचिकेँ मारि नहि सकल, जंगलमे छोड़ि देलक आ हरिणक खून ल' आएल। जंगलमे एक बूढ़ी बलरुचिकेँ पोसलनि, जे स्वयं डाइन छलीह।

बहुत दिनक बाद राजाक पालकी ओहि जंगल देने गुजरल। एकटा कहार मरि गेल, आ ओकर ठाम बलरुचि पकड़ल गेलाह। बाटमे राजा एकटा गीत गुनगुनाबय लगलाह, मुदा बीचक पाँती बिसरि गेलाह। पालकीक नीचासँ नव कहार ओ पाँती पूरा क' देलक। ओ गीत राजाक अतिरिक्त मात्र बलरुचि जनैत छलाह। एहि तरहेँ एकटा गीत बिछुड़ल लोककेँ चिन्हा देलक। रानीकेँ पश्चाताप भेलनि, मुदा जखन बलरुचि घुरय लगलाह त' बूढ़ी डाइन मन्त्रक प्रहार कयलनि। रानी अपन विद्यासँ ओकर काट कयलनि आ डाइन हारि गेलि। तकर बाद रानी बलरुचिक रक्षाक लेल हर साल अनुष्ठान करबाक आदेश देलनि, आ धीरे-धीरे सामान्य घरक माय सभ सेहो अपन सन्तानक रक्षाक लेल ई अनुष्ठान अपना लेलनि। झिझियाक गीत सभमे आइयो चित्रसेन आ रानीक कथा-प्रसंग गाओल जाइत अछि।

झिझियाक गीत दू तरहक होइत अछि: एक, देवीक स्तुति; दोसर, डाइन आ टोना-टापरसँ रक्षाक गुहारि। सभसँ चिन्हल पाँती गामक देवता ब्रह्म बाबाकेँ सम्बोधित अछि: "तोहरे भरोसे बरहम बाबा झिझिया बनेलियै हो, बरहम बाबा झिझिया पर होइयौ ने सवार।" अर्थात्, अहींक भरोसे हम सभ झिझिया सजौलहुँ, ब्रह्म बाबा, आबि क' एहि पर विराजू। ई गीत कोनो पोथीमे नहि, मायक कंठमे सुरक्षित रहल अछि। ढोल, झालि आ थपड़ीक ताल पर गाओल ई गीत मिथिलाक लोकस्मृतिक एकटा जीवित अभिलेख थिक।

मुदा एहि इजोतकेँ मिझेबाक खतरा सेहो आएल। गामसँ शहर आ खेतसँ परदेश जाइत पुस्त, आ व्यस्त जीवनक बीच झिझिया पछिला किछु दशकमे कमजोर पड़ैत गेल। धनुषाक किछु गाममे ई नाच लगभग बन्द भ' गेल छल। एहि बीच ई परम्परा सभसँ बेसी निष्ठासँ मुसहर समुदायक महिला सभ जोगौलनि, जे तराई-मधेसक सभसँ हाशिया पर राखल दलित समुदायमे गनल जाइत छथि। जखन बाँकी समाज लग समय नहि रहल, तखनो ओ सभ हर दसैंमे दुर्गाक लेल घैल उठबैत रहलीह। मिथिलाक संस्कृतिक बहुत किछु एहिना बचल अछि: ओहि हाथमे, जकरा इतिहास कहियो श्रेय नहि देलक।

पछिला किछु वर्षमे जनकपुरधाममे पुनर्जागरणक लहरि उठल। मिथिला वाइल्डलाइफ ट्रस्ट सन संस्था मुसहर समुदायक महिला सभकेँ संगठित क' जानकी मन्दिरक मंच धरि अनलक, आ नाच हुनका लेल सम्मानक संग आयक साधन सेहो बनल। एक नचनिहारि चन्दा कला सदा कहने छलीह जे संगी सभक संग झिझिया नचैत-नचैत ओ बेसी साहसी भ' गेलीह। सन् २०१८ सँ शहरी युवा आ सांस्कृतिक संस्था सभ गाम-गामक झिझिया टोलीकेँ शहरक मंच पर बजाबय लगलाह, आ गाम आ शहर दुनू ठाम नव टोली ठाढ़ भेल। आइ जनकपुरक मठ-मन्दिर आ दसैंक पण्डालमे हर साँझ झिझियाक रौनक देखल जाइत अछि। सन् २०२४ मे भारतक गणतन्त्र दिवस समारोहमे नयाँ दिल्लीमे सेहो झिझिया प्रस्तुत भेल।

हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालयक शोधकर्ता मोनिका मोटिन सन् २०२२ सँ २०२४ धरि धनुषामे कयल अपन अध्ययनमे देखौने छथि जे झिझिया आब दू जीवन जीबि रहल अछि। एक दिस ई दसैंक अनुष्ठान अछि, जे किछु विशेष जातिक महिला एही पाबनिमे करैत छथि। दोसर दिस ई सालभरि मंच पर प्रस्तुत होइत लोकनृत्य आ मैथिल पहिचानक प्रतीक बनि गेल अछि। झिझिया की थिक आ कोना नाचल जाय, एहि पर आइयो मतभेद अछि, मुदा अनुष्ठानसँ धरोहर दिसक एहि यात्रा मेटाइत नाचकेँ नव जीवन देलक अछि। पच्चीस वर्षसँ झिझिया खेलैत जनकपुरक एक महिलाक बात एहि बदलावकेँ सहजेँ कहैत अछि: पहिने घर-घर जाइत छलहुँ, आब मन्दिर आ कार्यक्रम धरि सीमित भ' गेल अछि।

झिझियाकेँ पढ़ैत काल एकटा असहज सत्य सेहो सोझाँ अबैत अछि। जाहि डाइनसँ रक्षाक गीत गाओल जाइत अछि, ओ 'डाइन' शब्द तराई-मधेसक वास्तविक जीवनमे बहुतो निर्दोष महिला, प्रायः विधवा, वृद्ध आ गरीब, पर लगाओल आरोप बनि जाइत अछि। नेपालमे बोक्सीक आरोपकेँ दण्डनीय अपराध बनबैत अलग कानून बनल अछि। द देहात एहि लोकविश्वासकेँ परम्पराक अंशक रूपमे अभिलेखित करैत अछि, मुदा कोनो महिला पर डाइनक आरोपकेँ कखनो उचित नहि मानैत अछि। झिझियाक असल शक्ति अन्हारमे एकजुट महिलाक इजोत थिक, ककरो पर आँगुर उठाएब नहि।

झिझिया हमरा सभकेँ स्मरण करबैत अछि जे देहातक संस्कृति संग्रहालयमे नहि, आँगनमे जीबैत अछि। एकटा माटिक घैल, किछु छेद, एक दीप आ सामूहिक स्वर: एतबहिसँ मिथिलाक महिला सभ शताब्दीसँ अन्हारक सामना करैत आएल छथि। राजा चित्रसेनक कथामे एकटा बिसरल गीत हेरायल सन्तानकेँ घर घुरौलक। आइ ओहिना झिझियाक गीत मिथिलाकेँ अपन जड़ि धरि घुरबैत अछि। जा धरि कोनो आँगनमे घैल पर दीप जरैत रहत, ता धरि ई स्मृति नहि मेटाएत।

अपन गाम-टोलक झिझिया गीत, कथा भा फोटो [email protected] पर पठाउ। द देहात ओकरा अभिलेखमे सुरक्षित राखत।

सन्दर्भ: Monica Mottin, "Heritage-making and the Revival of Jhijhiya in Janakpurdham", Rigvedic Himalaya 1(1), 2024; द काठमाण्डू पोस्ट (दिसम्बर २०१९); सेतोपाटी; अनलाइनखबर।