आसिन कृष्ण अष्टमीक दिन तराई-मधेसक लाखो माय अन्न टा नहि, पानि धरि त्यागि दैत छथि। सन्तानक दीर्घायुक लेल राखल जाइबला एहि कठिन व्रतक कथा आ गीत पुस्त-दर-पुस्त मायेक मुँहें जीवित अछि।
असोज १८ गते रवि दिन भोरे, सुरुज उगबासँ पहिनहि तराई-मधेसक गाम-गाममे माय सभ अन्तिम बेर किछु खाइत छथि। तकर बाद चौबीस घण्टासँ बेसी काल धरि हुनक मुँहमे एक बुन्न पानि सेहो नहि जाइत छनि। ई थिक जितिया, जकरा शास्त्रमे जीवित्पुत्रिका व्रत कहल जाइत अछि, अर्थात् "जिनकर सन्तान जीवित रहनि"। मैथिली, भोजपुरी, थारू, बज्जिका आ मगही भाषी समाजक माय सभ ई व्रत अपन सन्तानक दीर्घायु आ कुशलताक कामनासँ रखैत छथि। नेपाल सरकार एहि दिन व्रत रखनिहारि महिलाक लेल सार्वजनिक छुट्टी दैत अछि, मुदा ई पाबनि कोनो सरकारी पतरासँ बहुत पुरान अछि।
जितियाक तैयारी एक दिन पहिनहिसँ आरम्भ भ' जाइत अछि। सप्तमीक दिनकेँ नहाय-खाय कहल जाइत अछि। एहि दिन माय सभ नहा-सोना क' शुद्ध भोजन करैत छथि। मिथिलामे एहि दिन माछ आ मड़ुआक रोटी खेबाक चलन अछि। खेत आ पोखरिसँ आएल ई सादा भोजन कठिन व्रतक तैयारी थिक। अष्टमीक भोर सुरुज उगबासँ पहिने ओठगन क' क' व्रत आरम्भ होइत अछि, आ भरि दिन आ भरि राति माय सभ निराहार आ निर्जला रहैत छथि। साँझमे जीमूतवाहनक पूजा होइत अछि, आ टोलक स्त्रीगण एक ठाम जुटि क' व्रतक कथा सुनैत छथि। नवमीक भोर पारण क' क' व्रत तोड़ल जाइत अछि। तकर बाद माय सभ लाल आ पीयर सूतमे गाँथल जितिया गरामे पहिरैत छथि। बहुतो घरमे एहि सूतमे सोन वा चानीक छोट सन लॉकेट रहैत अछि, जे पुस्त-दर-पुस्त सासुसँ पुतहु आ मायसँ धीया धरि अबैत रहल अछि।
एहि व्रतक केन्द्रमे राजकुमार जीमूतवाहनक कथा अछि। जीमूतवाहन अपन दया आ त्यागक लेल प्रसिद्ध छलाह। एक दिन वनमे घुमैत काल ओ एकटा बूढ़ नागमाताकेँ कनैत देखलनि। कारण पुछला पर नागमाता कहलनि जे गरुड़सँ भेल शर्तक अनुसार नित्य एकटा नाग ओकर आहार बनैत अछि, आ आइ हुनक एकमात्र बेटाक पारी छनि। नागमाताक दुःख देखि जीमूतवाहनक मन पघिलि गेलनि। ओ नागमाताक बेटाक बदलामे अपनाकेँ लाल वस्त्रमे लपेटि गरुड़क आबय बला ठाम जा क' बैसि रहलाह। गरुड़ हुनका पकड़ि अकास दिस उड़ि गेल। मुदा ओकर आहार ने कनैत छल, ने डेराइत छल। ई देखि गरुड़ अचरजमे पड़ि गेल आ पुछलक, "अहाँ के छी?" जीमूतवाहनक कथा सुनि गरुड़ एतेक प्रभावित भेल जे ओ नाग खाएब छोड़ि देलक आ मारल गेल सभ नागकेँ फेरसँ जीवनदान देलक। ओहि दिनसँ जीमूतवाहन सन्तानक रक्षकक रूपमे पूजल जाइत छथि, आ माय सभ हुनके नाम पर ई व्रत रखैत छथि।
आँगनमे सुनाओल जाइबला दोसर कथा आओर घरेलू आ मार्मिक अछि, चिल्हो आ सियारिनक कथा। एकटा चिल्हो आ एकटा सियारिन संगे जितियाक व्रत रखबाक संकल्प लेलक। भरि दिन दुनू भुखले रहल। मुदा राति होइते भूखसँ व्याकुल सियारिन चोरा क' खा लेलक, जखन कि चिल्हो अपन व्रत पूरा कयलक। अगिला जन्ममे दुनू मनुक्ख भ' क' जनमल। चिल्होक सभ सन्तान जीवित रहल आ फुलायल-फलायल, मुदा सियारिनक एकोटा सन्तान नहि बाँचल। दादी-नानी जखन पोती-नातिनकेँ ई कथा सुनबैत छथि, तँ सिखाबय बला बात सदिखन एके रहैत अछि: ममतामे छल नहि चलैत अछि, आ मायक त्याग कहियो व्यर्थ नहि जाइत अछि।
पूब आ मध्य तराईक थारू समाजमे जितिया विशेष उल्लाससँ मनाओल जाइत अछि। व्रतक राति थारू महिला सभ टोली बना क' झमटा नचैत छथि आ गीत गबैत छथि। एहि गीत सभमे मायक ममता, धानरोपनी आ कटनीक समय आ गामक जीवन एक ठाम मिलल रहैत अछि। भूख आ थकनीक बीच सेहो भरि राति चलय बला ई नाच एकसरि व्रतकेँ सामूहिक शक्तिमे बदलि दैत अछि।
परम्परासँ जितिया बेटाक लेल राखल जाइबला व्रत मानल जाइत छल। मुदा समयक संग एकर अर्थ पसरैत गेल अछि। आइ बहुतो परिवारमे माय सभ बेटा आ बेटी दुनूक लेल व्रत रखैत छथि। एकटा आओर परिवर्तन ओतबे गहींर अछि। तराई-मधेसक बहुतो घरमे आइ व्रत रखनिहारि माय गाममे छथि, मुदा जिनका लेल ओ भुखल छथि, से सन्तान खाड़ी, मलेसिया वा भारतक शहरमे काज क' रहल छथि। गाममे एकटा माय भरि दिन एक बुन्न पानि पीने बिना रहैत छथि, आ हजारो किलोमीटर दूर हुनक सन्तान मरुभूमिक रौदमे पसेना बहा रहल छथि। जितिया आब मायक ममता आ परदेसक पीड़ा दुनूक पाबनि बनि गेल अछि।
जितिया मनेबाक लेल ने कोनो पुरोहित चाही, ने कोनो लिखल विधि। एकर कथा, नियम आ गीत मायसँ धीया धरि, सासुसँ पुतहु धरि मुँहे-मुँहे चलैत आएल अछि। ई स्त्रीगणक सहेजल ज्ञान थिक, जे पोथीमे नहि, स्मृतिमे जीवित अछि। आ जँ कोनो पुस्ता ई स्मृति बिसरि जाए, तँ ई सदाक लेल हेरा जाइत अछि। मैथिली, भोजपुरी आ थारू भाषाक जितिया गीत आ कथाक संकलन करब मात्र भाषा संरक्षणक काज नहि, पुस्त-दर-पुस्त माय सभक बहि क' आनल इतिहासकेँ बचेबाक काज सेहो थिक।
अहाँक घरमे जितिया कोना मनाओल जाइत अछि? अपन भाषामे जितियाक गीत, कथा वा अनुभव [email protected] पर पठाबी। देहात ओकरा अभिलेखमे सुरक्षित राखत।
